Friday, 13 May 2016

Diving into the Past


Dear Friends,
I wrote the following poem during my visit to L&T cement plant in 1986
That was when CSR was a " matter of heart " and before Govt reduced it to a " matter of law "
I hope you enjoy it
with regards,
hcp
(M) 0 - 98,67,55,08,08

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आओ , पकडलो हाथ

आवारपुर  उठो  ,

अभी तो बहुत लम्बी सफर बाकी हैं
क्यूंकि
अभी भी तुम्हारी छावं में
बैलो की जगह  खेत में ,
 
बच्चे जूते जाते हैं  !

तुम महान हो ,
तुम्हारे कंधो पर
देश की जिम्मेवारी हैं  !

तुम्हे देखना है की
तुम्हारे पुर्जे कभी बंध हो पावे  ,
तुम्हारी मशीने
कभी सो जावे   !

मगर इन ऊंचाईओ से
जिसके कंधे पर तुम खड़े हो ,
उनकी आवाज़ भी तो सुननी है  !

तुम्हारी छाव में अभी भी ,
कई  माँ
बच्चे को रोटी के बदले
कहानी सूना के सूला देती है  !

तुम्हे अभी
लम्बी सफर तय करनी है  !

आओ , पकडलो हाथ
बिना जिनके साथ ,
तुम अकेले चल नहीं पाओंगे  ;

तुम्हारे जो हमसफ़र है
उन्हें छोड़के
क्या आगे बढ़ पाओंगे  ?

सुनहरी कल के सपने
देखने वालो , हम सब है  ;

रात भर सोनेवाले भी
हम सब है  ;

उठो , भयी भोर
और चल दो
इक नयी क्षितिज की और  !

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05  March  1986  /  #

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